मुर्गे की बाँग और सूर्योदय: नागा लोक-कथा


Murge Ki Baang Aur Sooryodaya: Lok-Katha (Nagaland)
मुर्गे की बाँग और सूर्योदय: नागा लोक-कथा
एक समय की बात है, सूर्य की गर्मी से तंग आकर सभी प्राणी सदैव उसे अपशब्द कहा करते थे । सूर्य को यह बात नापसंद थी कि अकारण उसे बदनाम किया जाए ।

अंत मे सूर्य के लिये यह सब असहनीय हो गया तो, एक रात्रि में अस्त होने के पश्चात सूर्य ने उदय होने से मना कर दिया । परिणाम स्वरूप धरती अंधकारमय हो गयी । रात-दिन व्याप्त इस इस अंधकार से सभी निराश हो उठे । उऩ्होने अपने कष्टों की गाथा सूर्य को सुनाई और अपने अपशब्दों के लिये क्षमा प्रार्थना करते हुए, सूर्य से पुनः उदय होने का निवेदन किया । किन्तु सूर्य ने पुनः न उदय होने की हठ न छोड़ी ।

अन्त में सब प्राणियों ने पक्षियों में सुंदर और बुद्धिमान पक्षी मुर्गे से अनुरोध किया कि वह सूर्य को पुनः प्रकाश प्रदान करने के लिये तैयार करे । मुर्गा सब प्राणियों का अनुरोध ठुकरा न सका और सूर्य के पास विनती करने चल दिया किन्तु वह रास्ते भर उस जंगली बिल्ली का भोजन बन जाने से भयभीत रहा जो उस मार्ग पर रहती थी ।

सूर्य के निकट पहुँच कर उसने विनती की, 'आप कृपा करके पुनः उदय हों, आपके उदय होने के स्वागत में प्रति प्रातःकाल छः द्वार खुले रहेंगे, जैसे जैसे आप एक-एक द्वार से उदित होंगे, मैं हर बार बाँग दूँगा ।' किन्तु सूर्य ने अपने ह्रदय को कठोर बनाते हुए उसकी विनती को अस्वीकर कर दिया ।

असफल होकर लौटते हुए मुर्गे ने कहा, ' मैं बहुत दूर से आपसे मिलने आया हूँ, आप मुझसे कम से कम यह वादा तो करिये कि, यदि लौटते समय जंगली बिल्ली ने मुझ पर आक्रमण किया, तो आप मेरी बाँग सुनकर, मेरी रक्षा के लिये अवश्य आएंगे ।' सूर्य ने मुर्गे की रक्षा का वचन दे दिया । मुर्गा लौट चला । कुछ दूर जाकर उसने सूर्य के वचन को परखने के लिये ज़ोर से बाँग दी जबकि वहां कोई जंगली बिल्ली नहीं आई थी । अपने वचन को पूरा करते हुए सूर्य तुरन्त ही उसकी रक्षा के लिये उदय हो गया ।

तब से आजतक जब भी मुर्गा बाँग देता है, सूर्य उसकी रक्षा के लिये उदय हो जाता है । इसलिये सूर्योदय के साथ हम मुर्गे की बाँग भी सुनते हैं ।

(सीमा रिज़वी)




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